22.6.05

परिचय

rajen jaipuria
13 अगस्त 1948 को जयपुर, कोरापुट (ओड़ीशा) में जन्में डॉ॰ राजेन जयपुरिया हिन्दी साहित्य में एम॰ए॰ तथा पी-एच॰ डी॰ हैं। हिन्दी साहित्य में गहरी अभिरुचि रखने वाले डॉ॰ जयपुरिया 1968 से हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं में सृजन कर रहे हैं। आपकी रचनाओं का प्रकाशन राष्ट्रीय स्तर की पत्र–पत्रिकाओं में हो रहा है, अनेक सहयोगी संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित हुईं हैं। हाइकु-दर्पण में आपके हाइकु प्रकाशित हुए हैं। इंन्टरनेट पर भी आपकी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है।
[हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध जालघर अनुभूति पर माह के हाइकुकार के रूप में आपके हाइकु प्रकाशित हुए हैं तथा हिन्दी कविताओं के हाइकु संकलन हाइकु कानन में आपकी कविताएँ प्रकाशित हुई हैं।]
प्रकाशित कृतियाँ- सोपानों के स्वर (काव्य-संग्रह) अगस्त 2003
सम्प्रति- ओड़िशा शिक्षा सेवा के अन्तर्गत हिन्दी अध्यापन
सम्पर्क- रीडर एवं अध्यक्ष, हिन्दी-विभाग
विनायक आचार्य महाविद्यालय
पोस्ट- ब्रह्मपुर (गंजाम) ओड़िशा -760006
दूरभाष-0680-2261691
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विभिन्न जाल-पत्रिकाओं पर प्रकाशित डॉ॰ राजेन जयपुरिया की रचनाओं के संम्पर्क-सूत्र-
अनुभूति पर माह के हाइकुकार- gg
हाइकु कानन (हाइकु संकलन)- gg
काव्य-कुंज (काव्य-संकलन)- gg

कविताएँ [1]

शब्द
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प्रकृति कि हरी चादर पर,
पद्म-पत्र औ
गुलाब की सुकोमल पंखड़ियों पर
तुषार पतन के पश्चात्
स्वप्नों की शब्दावली से
भगवाई-भोर ने
शब्द एक अद्वितीय शान्ति
पसन्द किया।
गिरि कन्दराओं के तिमिरालय
से लेकर
आभामय-उपवन के
तरु-तमाल तक ने
निज हर्ष को नहीं मन्द किया।
प्रीति-अप्रीति की
आशा-आशंकाओं से परे,
कर उठा पीहू-पीहू
समय का पपीहरा
तब
दिन चढ़े दिनकर ने
उच्च-प्रासादों के प्रांगण में
प्रस्फुटित अवर्णनीय आन्नद
को निहार औ
अनचाहे अन्जाने ही
समीप ही
निरावलम्बन में निहारते
नीड़ों औ क्षीणतर कुटीरों में
स्थित विवशताओं के
चिथड़ों से लिपटी,
कुण्ठावसादों के प्रागंण में सिपटी
जर्जर-इच्छाओं के
मरणासन्न-मुख को घूरा
इसी अन्तराल में
अगणित अर्थों की गलियों से
गुज़रता रहा वह शब्द
खिन्न होकर
चिथड़ाई अपनी आस्था लेकर
अन्यमनस्कता में स्वीकार
उसने नहीं छन्द किया।
पश्चिम के भाल पर
सिन्दूर छिटकने से पूर्व ही,
शैल-शिखर पर झूमते वृक्ष-बाहों में
संध्या के आलिंगन-बद्ध
होने से पूर्व ही
दिवस की वेदी पर
आह!
उस शब्द के
सारे अक्षर
बिखर गये।
***


समानान्तर
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उर में उफनते एक टीस को
देने हेतु अभिव्यक्ति
पाँखें आर्द्र कर पलकों की
टूक-टूक हुईं बूँदें
आँसू की,
रहा चिथड़ाया ह्दय
निर्द्वन्द्व।
जैसे
टूटा दायरा मानयताओं का
हुआ ह्रास रहस्यमय-तादात्मय का
कवियों की कल्पना का आधार
अपनी ज्योत्स्ना के तार-तार
को अब गिनता शशधर
हो विकल निस्पन्द।
सीढ़ियाँ तीन चढ़ कर
पीढ़ियाँ तीन गढ़ कर
धूल पंख से झाड़ कर
मोम पाषाण से बन कर
हौले से जीवन
पिघला जाये।
जैसेः
दीर्घ व नीरस
प्रदर्शन-व्यर्थाडम्बर
से विरक्त होकर
कोई धीरे से बाहर
दर्शक-दीर्घा त्याग कर
निकल जाये।
***


तुम कहो तो
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तुम कहो तोः
किसी गहरी खाई के
समीपस्थ
दुर्गम-दुर्ग की दीवार
से सटकर सोपान
बन जाऊँ,
ताकि
मेरे शीश पर पाँव रखकर
तुम शिखर को उठ जाओ।
तत्पश्चात्
तुम्हारे ही पदाघात से
मेरे रसातल-चुम्बन का
मुझे दुःख न होगा
मिल जाये यदि आभास मात्र
कि अधिकार गढ़ पर
तुमने पा लिया है।
तुम कहो तोः
तीव्रतर गति से
मैं करता मृत्यु का
आलिंगन चलूँ
तुम्हारी गवेषणा हेतु,
ताकि
मानव का अस्तित्व
विषय पर
कोई शोध-ग्रन्थ
लिख पाओ।
तत्पश्चात्
मेरी अर्थी को
कोई कंधा भी
न मिल पाये तो
मुझे दुःख न होगा
मिल जाये यदि आभास मात्र
कि शाशवत-सुनाम
तुमने पा लिया है।
तुम कहो तोः
इन नयनों में
नीरधि को बसा लूँ मैं,
ताकि
नीर की अभिव्यक्ति
हेतु
तुम्हें
शब्द-कोश
न ढूँढना पड़ जाये।
तत्पश्चात्
दिवालोक में
कदाचित् मुझे
टटोलना लाठी पड़ जाये
दुःख न होगा तथापि मुझे
मिल जाये यदि आभास मात्र
कि गीत जीवन का
तुमने गा लिया है।
तुम कहो तोः
कोई विदूषक
या हास्य का पात्र
ही बन जाऊँ,
ताकि
अस्तित्व को मेरे
कर नीलाम
तुम खिलखिला सको।
तत्पश्चात्
भले ही
मेरा व्यक्तित्व
जाये श्रीहीन
दुःख नहीं होगा तथापि मुझे
मिल जाये यदि आभास मात्र
कि दिव्य-जीवन
तुमने पा लिया है।
***


आकांक्षा
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है आकांक्षा
कि बनूँ
एक कूप
बीहड़ बियाबान
से गुज़रती
सर्पीली-पगडण्डी का,
ग्रीष्म की
चिलचिलाती
दुपहरी में
क्लान्त श्रान्त
पथिकों
की तृषा-शान्त
करते-करते
जो न
स्वयं
सूख जाय।
या
एक दृग
बाँस-बबूल
तक के
उर की टीम को
जो सहलाये,
निखिल-ब्रह्माण्ड
की
क्षुधा को
अन्न-ब्रह्म
के
प्रथम-सोपान
तक
पहँचाकर
मिट स्वतः
जिसकी
भूख जाय
अथवा
एक जिह्वा
अमृतमय-गिरा
आलोड़ित कर
दिग-दिगन्त को
जो
आप्यायित करे,
दण्ड-प्रहार, निशा-अहर
मास औ
संवत्सर
का
विलयन कर
सत्य-शिव-सुन्दर
को
समन्वित कर
जो स्वयं
अन्ततः
न हो
मूक जाय।
***


श्रेष्ठतर
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मैं एक-जल-कण
सोचता
किसी सीपी
के जठर में
भर जाऊँ।
तभी लगताः
होगा श्रेष्ठतर
यदि
मेघ बन बरसूँ
औ तृषित–अवनि–अधर
को तर
कर जाऊँ।
***


-डॉ॰राजेन जयपुरिया

कविताएँ [2]

कौन पत्र लिख जाता ?
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होगा इन सूनी राहों पर
आज किसका आगमन?
द्रुमदलों पर अपने
बिठाकर बावरा मन
रहा यह किसे दुलार ?
छायी हुई यह व्याकुलता
कैसी चहुँ ओर आज
अपनत्व–सुधा–पात्र भर
कोई मीठी सी आवाज़
रह–रह जाती है पुकार।
लिपि–भाषा कुछ भी नहीं
स्वर नहीं, सरगम नहीं,
काग़ज़ नहीं, कलम नहीं
शून्य क्षितिज में नाम मेरे
कौन पत्र लिख जाता है?
जाने वह कौन प्रियवर
कौतूहल मुझमें भरकर,
निशिदिन यूँ निरन्तर
लल्जा के अवगुण्ठन से
मुझे झाँक–झाँक जाता है?
***



सखा! तुम्हारे आने पर
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रात अमावस की अभी
ढली नहीं,
गूँजी हर्ष–काक–स्वर से
मेरे मन की
गली नहीं,
घूँघट–कोहरे का हटाकर
धूप–दुलहनिया
हँसेगी खिलखिल..........
....सखा! तुम्हारे आने पर।
लगा दिया बगिया की आँखों को
दाँव पर,
शिशिर–हेमन्त ने था
गिन–गिन,
पलकें राह पर बसन्त की
बिछाकर,
काट दिये वृक्षों ने वीराने
पल–छिन
तारक–वृन्द सी
चटख–चटख कर
लजीली–कलियाँ
दिखेंगी झिलमिल....
...सखा! तुम्हारे आने पर।
हुआ शब्दों का
अभी नहीं शब्दों से
सम्बन्ध,
मूक पड़े हैं साज़ बिना
सुनहले मेरे सवप्नों के
छन्द
परियाँ व्योम–विहार भूलकर
गीतों को मेरे
गायेंगी हिलमिल......
....सखा! तुम्हारे आने पर।
***


अनिकेतन में
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क्लान्त पथी मैं, पीछे मुड़ देखूँ
दिग–दिगन्त से उड़ती धूल।
गया उलझ पतझड़ के
पीते–पातों से,
पड़ा मैं जूझ समीर के
शीत–घातों से,
गलियों में गुलमोहर की
हुए अंकुरित बाँस–बबूल।
रहा भटक पवन
वीथियों में,
गया अटक कथन
तिथियों में,
स्तुति में हूँ उसी कुठारे की लीन
जिसने काटा स्वप्न–तरु का मूल।
न घुलाए कोई
अखियों से अंजन,
न बुलाए स्वर
बदल कर, खंजन
अनिकेतन मैं, गया जगती के
अनेक अपूर्व व्यापार भूल।
***


-डॉ॰राजेन जयपुरिया

कविताएँ [3]

मैं.........किन्तु
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मैं चल नहीं रहा किन्तु
जीवन–सोपानों पर
जमी हुई रेणु–राशि को
श्रम–सीकरों से धो लेने की
मात्र अहर्निश
चेष्टा कर रहा हूँ।
मैं खिल नहीं रहा किन्तु
लगीं थीं लजीली कलियाँ
स्वप्नों की
जब निःशब्द चटखने औ
उनके कौमार्य का चहेता मधुप
एकाएक ही
निज संगीत शेष कर
गया उड़ जब,
अन्तिम प्रस्फुटन के
फूलों को अब
एक–एक झरते देख रहा हूँ।
अरे! यह आलोक!!
यह चकाचौंध
करता आलोक!!
कदाचित् उस प्रदीप का है,
चरणों में जिसके
है समाधिस्थ विश्वास
छोड़ता निशिदिन निश्वास,
पाकर यह श्यामदेश, श्याम वेश,
औ श्वेत–श्यामल केश
हाय! हाथ मल रहा हूँ
मैं जल नहीं रहा किन्तु।
***
-डॉ॰राजेन जयपुरिया

21.6.05

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